श्रम की एन्ट्रॉपी

कॉर्पोरेट ऊष्मागतिकी का नरक

दुनिया के इस बदबूदार शोर में, जिसे कॉर्पोरेट जगत के ‘सफेदपोश गुलाम’ बड़े गर्व से ‘इकोसिस्टम’ कहते हैं, असल में कुछ भी नया नहीं हो रहा है। लोग इतालवी सूट पहनकर और प्लास्टिक की मुस्कान चिपकाए ऐसे घूमते हैं जैसे वे ब्रह्मांड के किसी महान रहस्य को सुलझाने जा रहे हों, जबकि हकीकत में वे केवल अपने पेट की चर्बी और कंपनी के बिजली बिल में इजाफा कर रहे हैं। अगर आप अपनी आँखों से वह ‘करियर’ नाम का मोतियाबिंद हटा दें, तो आपको दिखेगा कि यह सब बस एक साधारण, क्रूर और थका देने वाली ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का खेल है। हम जिसे ‘प्रगति’ कहते हैं, वह असल में ऊर्जा का वह व्यर्थ क्षय है जो हमें मौत के थोड़े और करीब ले जाता है।

श्रम: मांस के इंजनों का घर्षण

लोग अक्सर ‘टीम वर्क’ और ‘साझा विजन’ की बात करते हैं। यह सब एक मीठा, सड़ा हुआ भ्रम है। असलियत में, एक आधुनिक ऑफिस एक विशाल ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है, जिसे इल्या प्रिगोजिन ने परिभाषित किया था—लेकिन यहाँ संदर्भ बदल गया है। यहाँ ऑफिस एक ‘मांस भस्मक’ (Meat Incinerator) है, जहाँ इंसानी जीवन को ईंधन की तरह झोंका जाता है ताकि ऑक्सीजन को कार्बन डाइऑक्साइड और निरर्थक ईमेल में बदला जा सके। आपका श्रम क्या है? यह केवल उस ‘हीट’ का उत्सर्जन है जो संगठन को बिखरने से रोकता है। आप एक ऐसे चूहे हैं जो दौड़ तो रहा है, लेकिन पहिया वहीं का वहीं है।

यह श्रम वैसा ही है जैसे किसी भीड़भाड़ वाली बस में पसीने से लथपथ यात्रियों का एक-दूसरे से रगड़ खाना—ऊर्जा का एक ऐसा घिनौना आदान-प्रदान जिसका कोई उद्देश्य नहीं है। आप सुबह उठते हैं, कैफीन के जरिए अपने नर्वस सिस्टम को धोखा देते हैं, और फिर एक ऐसी मशीन का हिस्सा बन जाते हैं जो केवल शोर और कूड़ा पैदा करती है। यह एक लक्जरी कार की तरह है जो ट्रैफिक जाम में फंसी है; इंजन चल रहा है, पेट्रोल जल रहा है, और जहरीला धुआं निकल रहा है, लेकिन गाड़ी इंच भर भी आगे नहीं बढ़ रही। कितना हास्यास्पद है कि अपनी इस मानसिक कंगाली और असुरक्षा को छिपाने के लिए लोग लाखों रुपये की इस दिखावटी कलम का इस्तेमाल करते हैं। क्या सोने की निब से लिखे गए झूठ सच बन जाएंगे? यह कलम आपके विचारों को नहीं, बल्कि आपकी उस खोखली ‘सफलता’ के भ्रम को कागज़ पर उकेरती है जिसे आप खुद भी नहीं मानते।

बेवकूफी की इंतेहा है यह। हर मीटिंग, हर ‘सिंक-अप’ कॉल एन्ट्रॉपी (Entropy) को बढ़ाने का एक जरिया है। ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ की बात करना वैसा ही है जैसे किसी जलते हुए घर में एयर कंडीशनर चलाने की कोशिश करना। घर तो राख होगा ही, बस आप ठंडी हवा में मरने का भ्रम पाल सकते हैं।

सिलिकॉन के परजीवी

जब हम आधुनिक ‘सगणन यंत्रों’ (Computing Machines) और उनके ‘स्वतंत्र प्रसंस्करण’ की बात करते हैं, तो दार्शनिकों को लगता है कि हम चेतना के एक नए युग में हैं। सरासर बकवास। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के नजरिए से देखें तो ये एल्गोरिदम केवल एन्ट्रॉपी को और अधिक क्रूरता से प्रबंधित करने के तरीके हैं। इंसान तो कम से कम थकता था, उसे नींद आती थी, उसे भूख लगती थी—ये उसकी सीमाएँ थीं जो व्यवस्था को पूरी तरह से निगलने से रोकती थीं। लेकिन ये सिलिकॉन के परजीवी कभी नहीं थकते। वे व्यवस्था को इतना ‘परफेक्ट’ कर देते हैं कि उसमें इंसान के लिए कोई जगह ही नहीं बचती।

हम अब निर्माता नहीं हैं। हम केवल उस डेटा के लिए ‘कच्चा माल’ (Raw Material) हैं जिसे ये मशीनें चबाती और थूकती हैं। हमारा अस्तित्व सड़क किनारे पड़े उस कूड़े की तरह है जिसे एक आधुनिक सफाई मशीन उठाकर रीसायकल कर देती है—उसकी कोई पहचान नहीं बचती, बस एक सांख्यिकीय आंकड़ा रह जाता है। जिसे आप ‘क्रिएटिविटी’ कहते हैं, वह असल में इन परजीवियों के लिए केवल एक ‘पैटर्न’ है। इस व्यवस्था में ‘जुनून’ या ‘वफादारी’ जैसे शब्दों का उपयोग करना वैसा ही है जैसे किसी खराब हो चुके समोसे पर चांदी का वर्क लगाना। ऊपर से चमकता है, लेकिन अंदर केवल सड़ांध है। यह सड़ांध उस दिन साफ होती है जब आपकी जगह एक सस्ता कोड ले लेता है और आपको ‘संसाधन’ की श्रेणी से बाहर फेंक दिया जाता है।

शून्य और ताप मृत्यु

सतत विकास (Sustainability) का दावा करने वाली कंपनियाँ असल में एक असंभव, गणितीय रूप से गलत सपने को बेच रही हैं। भौतिकी का दूसरा नियम अटल है: किसी भी बंद सिस्टम में विकार बढ़ेगा ही। आप चाहे कितनी भी ‘ग्रीन’ ऊर्जा का उपयोग कर लें, आप ब्रह्मांड के कुल ताप को बढ़ा ही रहे हैं। बिजनेस का अंत हमेशा ‘हीट डेथ’ (Heat Death) में ही होता है। हर स्टार्टअप, हर साम्राज्य अंततः एक धूल भरा अध्याय बनेगा। हम मुम्बई के लोकल ट्रेन की उस भीड़ की तरह हैं, जहाँ दम घुट रहा है, गर्मी असहनीय है, लेकिन कोई उतर नहीं सकता क्योंकि बाहर केवल शून्य है। हम बस उस शून्य की ओर जाने वाली गति को ‘उत्पादकता’ का नाम देकर खुद को बहला रहे हैं। हम अपनी ही कब्र खोदने के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, और विडंबना यह है कि इस खुदाई के लिए भी हम ‘परफॉरमेंस बोनस’ की उम्मीद रखते हैं। ब्रह्मांड को आपकी मेहनत की परवाह नहीं है; उसे बस आपकी ऊर्जा चाहिए, और वह उसे छीन ही लेगा।

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