जब आधुनिक सूट-बूट पहने वेतनभोगी ‘हमारे संगठन का मिशन’ और ‘भविष्य की दृष्टि’ जैसे शब्दों का उच्चारण करते हैं, तो उनके गले से एक ऐसी सड़ी हुई दुर्गंध आती है, जो पुरानी दिल्ली की गलियों में दो दिन पुराने तेल में तले गए समोसे की याद दिलाती है। यह तेल बार-बार गर्म किया गया है, काला पड़ चुका है, और अब यह केवल पेट में मरोड़ और दिल में जलन पैदा करने के लायक बचा है। जिसे आप ‘कॉरपोरेट संरचना’ कहते हैं, वह कोई भव्य मंदिर नहीं है जहाँ भविष्य का निर्माण हो रहा हो; वह वास्तव में एक विशालकाय कचरा भस्मक (Incinerator) है, जो केवल उच्च अधिकारियों के लालच रूपी ऊष्मा को बनाए रखने के लिए, हज़ारों कर्मचारियों की जवानी और समय को जलाकर एन्ट्रापी (Entropy) का धुआं छोड़ रहा है।
अव्यवस्था का महँगा उत्सव
इल्या प्रिगोजिन ने जब ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) या ‘अपव्ययी संरचना’ का सिद्धांत दिया था, तो उनका उद्देश्य ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाना था। लेकिन आज के अधपके एमबीए (MBA) धारकों ने इसे अपनी अक्षमता को छिपाने का कवच बना लिया है। वे सोचते हैं कि वे अराजकता से व्यवस्था पैदा कर रहे हैं। क्या बकवास है। हकीकत यह है कि एक संगठन ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम के खिलाफ लड़ी जा रही एक हारी हुई, दयनीय लड़ाई है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप दिल्ली के पीक-आवर ट्रैफिक में अपनी कार का हॉर्न बजाकर यह उम्मीद करें कि जाम खुल जाएगा। वह हॉर्न, वह शोर, वह पेट्रोल का जलना—यह सब कुछ और नहीं, बस शुद्ध ‘ऊष्मीय बर्बादी’ (Thermal Waste) है। संगठन के भीतर 90% ऊर्जा उन मीटिंग्स में खप जाती है जिनका कोई निष्कर्ष नहीं निकलता, और उन पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन को बनाने में जिनका एकमात्र उद्देश्य वास्तविकता पर पर्दा डालना है।
इस निरर्थक ऊष्मागतिकी प्रक्रिया का सबसे भद्दा मजाक देखना हो, तो ज़रा उस वातानुकूलित केबिन में झांकिए जहाँ कोई सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बैठा है। उसकी मेज पर, जिसे वह अपनी सत्ता का सिंहासन मानता है, एक हाथ से बनी इतालवी चमड़े की डायरी रखी होती है। इसकी कीमत इतनी है कि एक मध्यमवर्गीय परिवार का महीने भर का राशन आ जाए, लेकिन इसमें लिखा क्या जाता है? अगले वित्त वर्ष के लिए खोखले लक्ष्य और काल्पनिक आंकड़े। उस चिकने चमड़े को अपनी उंगलियों से सहलाते हुए, वह व्यक्ति अपनी बढ़ती हुई एन्ट्रापी और अपने अस्तित्व की निरर्थकता से नज़रे चुराने की कोशिश करता है। यह योजना बनाना नहीं है; यह मौत के डर से बचने का एक महंगा टोटका है।
एल्गोरिदम की भूख और बासी सूप
आजकल इस सड़ते हुए सिस्टम पर ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (AI) का लेप लगाने का फैशन चल पड़ा है। लोग इसे ‘सह-अस्तित्व’ और ‘सिनर्जी’ का नाम देते हैं। अरे भाई, यह कोई सह-अस्तित्व नहीं है। यह तो फ्रिज से निकाले गए ठंडे, बेस्वाद सूप को माइक्रोवेव में गर्म करने जैसा है। आप बिजली (ऊर्जा) खर्च करके उसे खाने लायक बनाने का नाटक करते हैं, लेकिन उसका स्वाद मर चुका है।
AI और एल्गोरिदम का काम समस्या को सुलझाना नहीं है, बल्कि उस गति को बढ़ाना है जिससे हम अपने संसाधनों को चबाते हैं। कर्मचारी अब अपनी कुर्सियों पर बैठकर केवल डेटा के उन पहाड़ों को घूर रहे हैं जिन्हें वे समझते तक नहीं हैं। यह प्रक्रिया वैसी ही है जैसे कोई भूख मिटाने के लिए अपने ही नाखूनों को कुतर रहा हो। AI ने बस इतना किया है कि अब हम अपने नाखून ज्यादा तेज़ी से और कुशलता से कुतर सकते हैं। ऑफिस की हवा में जो तनाव और उमस है, वह उस नमी जैसी है जो बरसात के दिनों में मुंबई की लोकल ट्रेन में किसी अजनबी की पसीने से भीगी शर्ट से आती है और आपकी त्वचा पर चिपक जाती है। दम घुटता है, जी मिचलाता है, लेकिन आप मुस्कुराते हुए ‘ओके’ कहते हैं क्योंकि बाहर की दुनिया इससे भी ज़्यादा क्रूर है।
मूल्य निर्माण का ढोंग
जब ये संस्थाएं ‘सार्वजनिक मूल्य’ (Public Value) या ‘सामाजिक जिम्मेदारी’ की बात करती हैं, तो यह पाखंड की पराकाष्ठा होती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई अमीरज़ादा अपनी कार की खिड़की से सड़क पर कचरा फेंके और फिर उसे साफ़ करने वाले को भीख देकर खुद को मसीहा समझे। संगठन समाज में एन्ट्रापी और विकार पैदा करते हैं, और फिर उसके छोटे से हिस्से को ठीक करने का नाटक करके अपनी छवि चमकाते हैं। जिसे वे ‘इनोवेशन’ कहते हैं, वह अक्सर पुराने विचारों की पैकेजिंग बदलकर उन्हें नए मूर्खों को बेचने की कला भर है।
इस ‘गतिशील संतुलन’ (Dynamic Equilibrium) में फंसे लोग—जो वास्तव में एक सड़ते हुए दलदल में गर्दन तक धंसे हैं—एक अजीब सी बेहोशी में जीते हैं। वे जानते हैं कि यह सब झूठ है। वे जानते हैं कि ‘टीम वर्क’ का मतलब है ‘मेरी गलती तुम अपने सिर ले लो’। फिर भी, वे उस नाटक में अपना रोल निभाते हैं। और जब किसी बड़े समझौते पर हस्ताक्षर करने का वक्त आता है, तो वे अपनी जेब से एक सीमित संस्करण वाला लग्जरी फाउंटेन पेन निकालते हैं। वह पेन, जो स्याही नहीं, बल्कि अहंकार उगल रहा है। वे उस कागज़ पर अपना नाम लिखते हैं, यह सोचते हुए कि वे इतिहास बना रहे हैं, जबकि असल में वे केवल ब्रह्मांड की अव्यवस्था में अपना छोटा, गंदा योगदान दे रहे हैं।
अबे यार, अब बस भी करो। यह सब सोचकर ही सिर में दर्द होने लगा है। मुझे इस वातानुकूलित श्मशान से बाहर निकलकर कहीं खुली हवा में सांस लेनी है, जहाँ कम से कम गंदगी तो असली हो। बकवास है सब।
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