श्रम का सांख्यिकीय पाखंड

पिछले हफ्ते हमने इस बात पर माथापच्ची की थी कि कैसे आधुनिक सभ्यता ने ‘विश्राम’ को एक अक्षम्य अपराध घोषित कर दिया है। आज उसी सड़े हुए धागे को थोड़ा और खींचते हैं, शायद कुछ और भी उधड़ जाए। जब आप सुबह की उस दम घोंटने वाली मेट्रो में, किसी अजनबी के पसीने की खट्टी गंध सूंघते हुए दफ्तर की ओर घिसटते हैं, तो आप अपने मन को यह झूठी तसल्ली देते हैं कि आप ‘राष्ट्र निर्माण’ या ‘सार्वजनिक सेवा’ के महान यज्ञ में आहुति देने जा रहे हैं। लेकिन सच का सामना करने की हिम्मत बहुत कम लोगों में होती है। असल में, आप बस उस विशालकाय मशीन के एक घिसे हुए बोल्ट हैं जिसे कल सुबह बिना किसी चेतावनी के कबाड़ में फेंक दिया जाएगा। आपकी यह तथाकथित ‘मेहनत’ और कुछ नहीं, बस आपकी खाली जेब और एक अतृप्त भूख के बीच का वह फासला है जिसे आप कभी भर नहीं पाएंगे। जिसे हम कॉरपोरेट जगत में ‘कैरियर प्रोग्रेस’ कहते हैं, वह दरअसल प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठकर अपनी रीढ़ की हड्डी को टेढ़ी करने का एक महंगा और कष्टदायक तरीका है। यह सब कुछ वैसा ही है जैसे गली के नुक्कड़ पर मिलने वाले वो तेल में डूबे छोले-भटूरे, जो खाते वक्त तो जीभ को जन्नत का अहसास कराते हैं, लेकिन बाद में पेट में तेजाब और रातों की नींद हराम करने वाली बेचैनी भर देते हैं। क्या तमाशा है।

मूल्य का नरक और ज्यामितीय ढोंग

अब जरा अपनी इस लाचारी को विज्ञान और गणित के भारी-भरकम शब्दों के पीछे छिपाने की कोशिश करते हैं। जिसे विद्वान ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) या ‘सांख्यिकीय मैनीफोल्ड’ (Statistical Manifold) पर एक बिंदु से दूसरे बिंदु का विस्थापन कहते हैं, वह असल में आम आदमी की बेबसी का घुमावदार रास्ता है। यदि हम फिशर सूचना मैट्रिक्स (Fisher Information Matrix) को पैमाना मानें, तो आपकी ‘सार्वजनिक सेवा’ का असली माप वह दूरी है जो एक सरकारी बाबू की मेज पर पड़ी आपकी फाइल और उसे खिसकाने के लिए मांगी गई रिश्वत के बीच है।

यह वह ‘कर्वेचर’ (Curvature) है जो उस वक्त महसूस होता है जब आप ट्रैफिक जाम में फंसे होते हैं; टैक्सी का मीटर भाग रहा होता है, जेब कट रही होती है, लेकिन गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ती। यह एक ऐसा सांख्यिकीय दुष्चक्र है जहाँ विस्थापन शून्य है, लेकिन ऊर्जा का व्यय अधिकतम। आपके मस्तिष्क में उठने वाला ‘संतुष्टि’ का भाव केवल डोपामाइन का एक अस्थायी और धोखेबाज स्पाइक है—ठीक वैसे ही जैसे एक खराब बैटरी वाला स्मार्टफोन चार्जर लगाते ही 100% दिखाता है, लेकिन केबल हटाते ही दम तोड़ देता है। हम एन्ट्रापी (Entropy) को कम नहीं कर रहे, हम बस अपने जीवन की अव्यवस्था को ‘मीटिंग्स’ और ‘पीपीटी’ के नाम पर री-अरेंज कर रहे हैं। पागलपन है यह सब।

दिखावे का अर्थशास्त्र

विडंबना देखिए, आज के इस बाजार में हम ‘मूल्य’ का निर्धारण इस आधार पर नहीं करते कि काम कितना हुआ, बल्कि इस आधार पर करते हैं कि हमने कितनी सफाई से और कितने महंगे तरीके से ‘जटिलता’ का ढोंग रचा है। किसी भी दफ्तर के उस बॉस को देखिये जो अपनी औकात और ‘क्लास’ दिखाने के लिए अपनी शर्ट की जेब में Montblanc का वह महंगा फाउंटेन पेन टांग कर घूमता है। उस पेन की कीमत शायद आपके घर के दो महीने के राशन से ज्यादा होगी, लेकिन उससे वह केवल उन कागजों पर दस्तखत करता है जिनका रद्दी के भाव में भी कोई मोल नहीं है। यह वैसा ही है जैसे किसी गड्ढे वाली टूटी सड़क पर फेरारी चलाना—दिखावा पूरा, शोर बहुत, लेकिन गति शून्य और नुकसान पक्का। हम एक ऐसी व्यवस्था में फंस चुके हैं जहाँ ‘सफलता’ का अर्थ है अर्थहीन चीजों को महंगे दामों पर बेचना। यह पूरी कॉरपोरेट सीढ़ी एक ऐसी फिसलन भरी ढलान है जहाँ आप जितना तेज दौड़ने की कोशिश करेंगे, उतनी ही जल्दी कीचड़ में मुंह के बल गिरेंगे।

मानवीय कचरा और मशीनी सन्नाटा

और अब, जब वे अदृश्य और बेजान मशीनें (जिनका नाम लेने से भी मुझे चिढ़ होती है) हमारे जीवन के हर कोने में अपनी सिलिकॉन जड़ें जमा रही हैं, आपकी ‘क्रिएटिविटी’ और ‘बुद्धिमत्ता’ का गुब्बारा फूटने की कगार पर है। जिसे आप अपनी ‘अद्वितीय मानवीय प्रतिभा’ समझते थे, वह उन मशीनों के लिए केवल सांख्यिकीय शोर (Statistical Noise) है। थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम अटल है: ब्रह्मांड में अव्यवस्था हमेशा बढ़ेगी। आपके आठ-दस घंटे के दफ्तर का पसीना अंततः ऊष्मा (Heat) और डेटा के कचरे के ढेर में तब्दील हो जाता है। यह वैसा ही है जैसे कोई आदमी जिम में ट्रेडमिल पर पागलों की तरह दौड़ रहा हो—पसीना असली है, थकान असली है, सांसें फूल रही हैं, लेकिन भौगोलिक रूप से वह अब भी उसी बिंदु पर खड़ा है जहाँ से उसने शुरू किया था।

श्रम अब केवल सूचना के प्रसंस्करण का एक जैविक और inefficient तरीका रह गया है। जब ये निर्दयी, भावना-रहित लोहे के दिमाग बिना थके, बिना लंच ब्रेक मांगे और बिना शिकायत किए सब कुछ कर सकते हैं, तो आपकी ‘भावनाओं’ और ‘मेहनत’ की कीमत बस उतनी ही रह जाएगी जितनी कि किसी फुटपाथ पर पड़ी खाली पानी की बोतल की होती है—जिसे लोग लात मारकर आगे बढ़ जाते हैं। हम बस संग्रहालय में रखने लायक पुरानी मशीनें हैं जो अब भी खुद को प्रासंगिक समझने की भूल कर रही हैं। मुझे तो घर जाना है, यह सब देखकर मेरा जी मिचलाता है।

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