अक्सर जब मैं विश्वविद्यालय की कैंटीन के कोने वाली मेज पर बैठकर ठंडी होती चाय को घूरता हूँ, और पास में बैठे उन कॉर्पोरेट ‘लीडर्स’ की बातें सुनता हूँ जो ‘सस्टेनेबिलिटी’ और ‘ऑर्गेनाइजेशनल कल्चर’ पर लंबे-चौड़े भाषण झाड़ रहे होते हैं, तो मुझे अपने प्याले में गिरती हुई उस मक्खी पर दया आती है। वह बेचारी कम से कम अपनी मौत की वास्तविकता को स्वीकार तो कर रही है, बिना किसी ‘विजन स्टेटमेंट’ के। ये आधुनिक संगठन, जो खुद को अमर समझते हैं, दरअसल ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के क्रूर नियमों के खिलाफ लड़ा जा रहा एक हारा हुआ युद्ध मात्र हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई भिखारी अपनी फटी हुई जेब में छेद सिलने के बजाय उसमें सोने के सिक्के डालने का सपना देख रहा हो। जिसे हम ‘व्यवस्था’ कहते हैं, वह केवल ब्रह्मांडीय अराजकता को कुछ पलों के लिए टालने का एक महंगा नाटक है।
श्रम
हर सुबह, लाखों लोग अपनी शर्ट पर प्रेस करवाकर, मेट्रो और बसों में धक्का-मुक्की करते हुए ऑफिस की ओर इस भ्रम में दौड़ते हैं कि वे समाज का निर्माण कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि वे केवल एक ‘ओपन सिस्टम’ (Open System) के जैविक पुर्जे हैं जो धीरे-धीरे घिस रहे हैं। इल्या प्रिगोगिन (Ilya Prigogine) ने जिसे ‘अपव्ययी संरचना’ (Dissipative Structure) कहा था, वह आपके ऑफिस का वह वातानुकूलित क्यूबिकल है जहाँ आप अपनी जवानी के सबसे कीमती साल उस डेटा को एक्सेल शीट में भरने में बिता देते हैं जिसका वास्तविक दुनिया में कोई अर्थ नहीं है। जिसे आप ‘टीम वर्क’ कहते हैं, वह असल में भीड़भाड़ वाली बस में एक-दूसरे से सटकर खड़े होने की मजबूरी है, जहाँ हर कोई दूसरे की पसीने की बदबू झेल रहा है ताकि अपनी मंजिल तक पहुँच सके।
पागलपन है।
एक संगठन को जीवित रहने के लिए बाहर से ‘नेगेटिव एन्ट्रॉपी’ (Negative Entropy)—यानी निवेशकों का पैसा और नए ‘बलि के बकरों’ की ऊर्जा—खानी पड़ती है। और बदले में यह सिस्टम क्या निकालता है? मानसिक तनाव, खालीपन, और वह कचरा जो पर्यावरण में फेंक दिया जाता है। यह एक अंतहीन चक्र है जहाँ आप अपनी ईएमआई भरने के लिए वह काम करते हैं जिससे आपको नफरत है, ताकि आप उन चीजों को खरीद सकें जिनकी आपको रत्ती भर भी जरूरत नहीं है। जिसे हम ‘कॉर्पोरेट विकास’ कहते हैं, वह दरअसल उस सड़ांध को बाहर धकेलने की एक हताश और हिंसक कोशिश है जो सिस्टम को अंदर से खोखला कर रही है। यह वैसा ही है जैसे कोई सड़ी हुई सब्जी पर महंगा परफ्यूम छिड़क कर उसे ताजा दिखाने की कोशिश करे और उम्मीद करे कि कोई उसे खरीद लेगा।
विनाश
चलिए, इसे थोड़ा और गहराई से, थोड़ा वैज्ञानिक क्रूरता के साथ समझते हैं। एन्ट्रॉपी का मतलब है—अव्यवस्था। ब्रह्मांड का हर हिस्सा मौत की ओर, यानी अधिकतम अव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। एक सफल व्यवसाय वह है जो इस विनाशकारी प्रक्रिया को ‘स्थगित’ करने में माहिर हो, बिल्कुल उस पुराने स्कूटर की तरह जिसे हर हफ्ते मैकेनिक के पास ले जाना पड़ता है और जो धुआं छोड़ते हुए चलता है। लेकिन इसकी असली कीमत क्या है?
आजकल के मैनेजर अपनी जेब में यह Montblanc का कीमती पेन लगाकर ऐसे घूमते हैं, जैसे कि यह कोई जादू की छड़ी हो जो उनके डूबते हुए मुनाफे और टीम के गिरते हुए मनोबल को बचा लेगी। वास्तविकता यह है कि जब यह पेन, जिसकी कीमत किसी मजदूर की साल भर की कमाई से ज्यादा है, आपकी सस्ती कमीज की जेब में स्याही छोड़ देता है, तो वह काला दाग ही आपके जीवन की एकमात्र ‘स्थायी’ उपलब्धि होती है। क्या यह पेन साइन करने से ब्रह्मांडीय एन्ट्रॉपी रुक जाएगी? नहीं। यह सिर्फ एक महंगा ‘सिग्नल’ है, जो यह दिखाने के लिए है कि हमारे पास इतनी फालतू ऊर्जा है कि हम उसे फिजूलखर्ची में बर्बाद कर सकते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे दिल्ली की भीषण गर्मी में कोई अमीर आदमी अपने घर का दरवाजा खुला रखकर एसी चला दे—अंदर ठंडक तो मिलेगी नहीं, बस बिजली का बिल बढ़ेगा और बाहर की गर्मी और ज्यादा बढ़ जाएगी।
सूचना ज्यामिति के नजरिए से देखें तो हम जो डेटा इकट्ठा करते हैं, वह उस पुराने कबाड़खाने की तरह है जहाँ एक काम की चाबी ढूंढने के लिए आपको टनों जंग लगे लोहे के नीचे दबना पड़ता है। आपकी जो साप्ताहिक ‘स्टेटस मीटिंग्स’ होती हैं, वे और कुछ नहीं बल्कि सामूहिक समय-हत्या का एक धीमा रूप हैं। वहाँ बैठे लोग सिर्फ घड़ी की सुई को घूरते हैं और सोचते हैं कि क्या आज रात के खाने में दाल मिलेगी या पिज्जा। यह सब केवल इसलिए है क्योंकि हमारा आदिम मस्तिष्क यह मानने के लिए प्रोग्राम किया गया है कि अगर हम ‘व्यस्त’ दिख रहे हैं, तो हम ‘जीवित’ हैं। घर जाना है मुझे।
शून्यता
अंततः, यह सब एक महान शून्य की ओर ले जाता है। जिसे हम ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ या ‘पब्लिक ऑर्डर’ कहते हैं, वह केवल एन्ट्रॉपी के प्रवाह का एक पैटर्न है। जैसे नाली के गंदे पानी में बनने वाला झाग—वह सफेद, चमकदार और ज्यामितीय रूप से सुंदर दिख सकता है, लेकिन है तो वह गंदगी ही। जिस दिन पानी का बहाव रुका, वह झाग गायब हो जाएगा, जैसे कि वह कभी था ही नहीं।
आजकल के ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ योद्धा इस Herman Miller की एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठकर—जिसकी कीमत सुनकर मुझे चक्कर आ जाता है और लगता है कि इसमें बैठने पर मोक्ष मिल जाएगा—दुनिया बदलने की बात करते हैं। लेकिन कड़वा सच तो यह है कि वह कुर्सी आपकी रीढ़ की हड्डी के अनिवार्य क्षय को नहीं रोक सकती। वह केवल आपके पतन को थोड़ा और ‘आरामदायक’ बना सकती है ताकि जब आप अंततः गिरें, तो आपको ज्यादा चोट न लगे। भौतिकी का नियम स्पष्ट है: आप व्यवस्था बनाने की जितनी अधिक कोशिश करेंगे, आप बाहरी दुनिया में दोगुनी अराजकता पैदा करेंगे।
इसलिए, अगली बार जब आपका बॉस आपको ‘विजन’, ‘मिशन’ और ‘अनंत विकास’ के बारे में बताए, तो उसकी आंखों में देखिए। आपको वहाँ केवल वही डर दिखेगा जो एक चूहे की आंखों में होता है जब उसे समझ आता है कि पिंजरे में रखा पनीर मुफ्त नहीं है। यह पूरा तमाशा, यह पूरी व्यवस्था, केवल उस गर्मी को दबाने का एक तरीका है जो अंततः हमें राख कर देगी। धुआं हर जगह है, और हम उसे ‘प्रगति’ का धुआं कहकर अपने फेफड़ों में भर रहे हैं। जो लोग सोचते हैं कि वे इतिहास रच रहे हैं, वे दरअसल केवल अपनी कब्र की खुदाई के लिए आधुनिक और महंगे औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
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