मज़दूरी की ज्यामिति

पिछले हफ्ते जब हम ‘कार्यक्षमता’ यानी एफिशिएंसी के खोखलेपन पर बात कर रहे थे, तो आपकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—शायद वह उम्मीद थी, या शायद शराब का नशा। आज उस नशे को उतारने का वक्त है। कॉर्पोरेट जगत जिस ‘ग्रोथ’ और ‘लर्निंग’ का ढोल पीटता है, वह असल में बासी मिठाई पर लगा हुआ चाँदी का वह वर्क है जो देखने में चमकदार है लेकिन आंतों के लिए ज़हरीला। जिसे आप अपना ‘करियर’ कहते हैं, वह मेरी नज़र में थर्मोडायनामिक्स और सांख्यिकी का एक क्रूर मज़ाक है।

मज़दूरी का सर्कस

एचआर (HR) विभाग वाले ‘ह्यूमन कैपिटल’ और ‘स्किल डेवलपमेंट’ जैसे भारी-भरकम शब्द ऐसे फेंकते हैं जैसे हम कोई हाड़-मांस के इंसान नहीं, बल्कि बही-खाते में लिखी गई कोई अमूर्त संख्या हों। कभी ठंडे दिमाग से सोचा है कि ‘स्किल’ असल में है क्या? यह आपकी आत्मा का विकास नहीं है, मेरे दोस्त। यह तो बस आपके दिमाग के न्यूरॉन्स को हथौड़े से पीट-पीटकर एक खास ज्यामितीय आकार देने की प्रक्रिया है, ताकि जब ‘बॉस’ नामक इनपुट मिले, तो आप बिना सोचे-समझे वही ‘यस सर’ वाला आउटपुट दे सकें जिसकी सिस्टम को दरकार है।

यह बिल्कुल वैसा है जैसे किसी पुरानी नोकिया की बैटरी को रगड़कर और चबाकर दो मिनट और चलाने की कोशिश करना। आप जिसे ‘अनुभव’ या एक्सपीरियंस कहते हैं, वह उस सड़क किनारे वाले समोसे के तेल जैसा है, जिसे इतनी बार खौलाया गया है कि अब वह सिर्फ कालिख और कोलेस्ट्रॉल का ज़हरीला मिश्रण रह गया है। स्वाद वही पुराना है, बस ज़हर थोड़ा और गाढ़ा हो गया है। और हम? हम उस ज़हर को ‘सैलरी’ के नाम पर खुशी-खुशी पी रहे हैं।

सांख्यिकीय मैनिफोल्ड का नरक

अब ज़रा अपनी इस लाचारी को गणित के ठंडे और बेजान चश्मे से देखिए। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के परिप्रेक्ष्य में, एक कर्मचारी का पूरा अस्तित्व एक ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ (Statistical Manifold) पर रेंगता हुआ एक तुच्छ बिंदु मात्र है। जब आप रातों को जागकर कोई नई कोडिंग भाषा, एक्सेल का फॉर्मूला या मैनेजमेंट का कोई नया फंडा सीखते हैं, तो आप असल में ‘फिशर इन्फॉर्मेशन मेट्रिक’ (Fisher Information Metric) के तहत उस मैनिफोल्ड पर एक दूरी तय कर रहे होते हैं।

यह दूरी आपकी मेहनत नहीं है। यह आपके ‘प्रायिकता वितरण’ (Probability Distribution) में आया हुआ बदलाव है। गणितीय रूप से, जिसे आप ‘सीखना’ कहते हैं, वह केवल आपके वर्तमान स्वरूप और कंपनी द्वारा वांछित आदर्श रोबोट के बीच के ‘कुल्बैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler divergence) को कम करने की कवायद है। सिस्टम को इससे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता कि आपकी आँखों में जलन हो रही है या आपकी रीढ़ की हड्डी चीख रही है; उसके लिए यह पीड़ा सिर्फ ज्यामितीय वक्रता (Curvature) का एक आंकड़ा है। आपकी थकान, आपका अवसाद, और मंडे मॉर्निंग की वो घबराहट—ये सब इस अनुकूलित समीकरण में आने वाले ‘एरर टर्म्स’ (Error Terms) हैं, जिन्हें ज़ीरो करना ही ‘मैनेजमेंट’ कहलाता है।

बकवास है ये सब।

एर्गोनॉमिक्स का महँगा झूठ

और इस प्रक्रिया में हम अपने शरीर का जो कबाड़ा करते हैं, उसे संभालने का बाज़ार देखिए। रीढ़ की हड्डी, जो इस विकास की अंधी दौड़ में सबसे पहले जवाब देती है, उसे सीधा रखने के लिए हम अपनी गाढ़ी कमाई लुटाने को तैयार बैठे हैं। लोग अपनी कमर बचाने के लिए डेढ़-दो लाख रुपये की Herman Miller Aeron जैसी कुर्सियाँ खरीदते हैं। ज़रा इस विडंबना पर गौर कीजिए—गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ सिर्फ सीधा बैठने की कीमत इतनी ज़्यादा? यह तो वही बात हुई कि कबाड़ में जाने वाली खटारा एंबेसडर कार में आप सोने का स्टीयरिंग व्हील लगवा लें।

हम सोचते हैं कि हम सुविधा खरीद रहे हैं, लेकिन असल में हम अपनी खुद की गुलामी को और आरामदायक बना रहे हैं ताकि हम कुर्सी से न उठें। ‘एर्गोनॉमिक्स’ पूंजीवाद का सबसे महंगा झूठ है। यह आपको आराम देने के लिए नहीं, बल्कि आपको सिस्टम से चिपकाए रखने के लिए बनाया गया है ताकि फिशर इन्फॉर्मेशन का फ्लो न टूटे। यह दर्द निवारण नहीं, बल्कि शोषण का लुब्रिकेशन है।

शून्य का समीकरण

पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और ‘स्किल इंडिया’ जैसे नारों का असली मकसद आपको सशक्त बनाना नहीं है। सरकारें और निगम चाहते हैं कि पूरा समाज एक विशाल, घर्षण-रहित मशीन बन जाए। वे चाहते हैं कि हम सब एक स्टैंडर्ड डेविएशन के अंदर फिट हो जाएं। जिस दिन यह सांख्यिकीय मैनिफोल्ड पूरी तरह मैप हो जाएगा, उस दिन ‘स्वतंत्र इच्छा’ (Free Will) का भ्रम भी कांच की तरह टूट जाएगा। आपकी सफलता, आपकी विफलता, सब कुछ एक साधारण कैलकुलस की समस्या होगी। भविष्य कोई सुनहरा सपना नहीं, बल्कि एक अनुकूलित समीकरण है जो यह तय करेगा कि जीडीपी के ग्राफ को एक मिलीमीटर ऊपर उठाने के लिए आज कितने करोड़ लोगों की शामें बर्बाद करनी होंगी।

तो अगली बार जब ‘अपस्किलिंग’ के नाम पर अपना वीकेंड कुर्बान करें, तो आईने में खुद को देखिएगा। आप बेहतर नहीं हो रहे। आप बस सिस्टम की भूख मिटाने के लिए खुद को एक सुपाच्य निवाले में बदल रहे हैं। आप इंसान नहीं, एक रिफाइंड एल्गोरिदम हैं।

घर जाने का मन कर रहा है।

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