कॉर्पोरेट नरक और ऊष्मागतिकी का क्रूर मज़ाक
संगठन नाम के इस विशाल कूड़ाघर में, जिसे आप अपना ‘करियर’ कहते हैं, वहां ‘रणनीति’ और ‘विज़न’ जैसे शब्द केवल उस भीषण दुर्गंध को छिपाने के लिए छिड़के गए सस्ते इत्र से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। हम जिसे कॉर्पोरेट जगत कहते हैं, वह असल में ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम के खिलाफ लड़ी जा रही एक हताश और हारने वाली लड़ाई है।
सड़न की भौतिकी: आपकी मेज़ हमेशा गंदी क्यों रहती है
ब्रह्मांड का सबसे बुनियादी नियम यह है कि हर चीज़ अंततः गंदगी और अव्यवस्था (Entropy) की ओर बढ़ती है। एक साफ सुथरा एक्सेल शीट, एक व्यवस्थित इनबॉक्स, और आपकी वह नकली मुस्कान—ये सब अस्थिर अवस्थाएँ हैं। यदि इन्हें एक पल के लिए भी अकेला छोड़ दिया जाए, तो ये भरी दोपहर में धूप में पड़ी मछली की तरह सड़ने लगते हैं और बदबू मारने लगते हैं।
‘व्यवस्था’ बनाए रखने का प्रयास करना, मूल रूप से, एक जाम हो चुके सार्वजनिक शौचालय को नंगे हाथों से साफ करने जैसा घिनौना और थकाऊ काम है। सूचना के हर एक टुकड़े को प्रोसेस करने में, हर एक ईमेल का जवाब देने में, आपका मस्तिष्क जो ऊर्जा जलाता है, वह सीधे तौर पर गर्मी पैदा करती है। यह केवल भौतिकी नहीं है; यह वह जलन है जो आप अपनी आंखों के पीछे महसूस करते हैं जब आप एक और निरर्थक मीटिंग में बैठे होते हैं। प्रबंधन को मीटिंग्स इतनी पसंद क्यों हैं? क्योंकि अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए, वे दूसरों के कीमती समय को जलाकर ऊष्मा पैदा करते हैं और कमरे के तापमान को बढ़ाते हैं। महीने के अंत में बैंक खाते में बची हुई चिल्लर और पेट में तनाव की मरोड़—बस यही वह एकमात्र वास्तविकता है जो बताती है कि यह सिस्टम अभी पूरी तरह से नहीं मरा है।
मैक्सवेल का शैतान और मुनाफ़ाखोर दुकानदार
19वीं सदी के भौतिकविज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने एक काल्पनिक ‘शैतान’ की कल्पना की थी जो अणुओं को छांटकर व्यवस्था बनाता है। आज के दौर में, यह शैतान वह मैनेजर है जो शीशे के केबिन में बैठा है। उसे लगता है कि वह सूचनाओं को छांटकर ‘वैल्यू’ पैदा कर रहा है, लेकिन हकीकत में वह केवल एक लालची दुकानदार की तरह व्यवहार कर रहा है। वह काम के लोगों और चापलूसों के बीच का अंतर किसी तर्क से नहीं, बल्कि अपनी सनक से तय करता है, और इसे अपनी इटालियन लेदर की उस महंगी डायरी में नोट करता है, जिसकी चमड़े की गंध उसे यह भ्रम देती है कि वह किसी ‘उच्च उद्देश्य’ के लिए काम कर रहा है।
लैन्डॉयर का सिद्धांत (Landauer’s Principle) स्पष्ट कहता है कि किसी भी जानकारी को मिटाने या छांटने के लिए ऊर्जा की कीमत चुकानी पड़ती है। जब एक सीईओ मंच पर खड़ा होकर ‘नई दिशा’ की घोषणा करता है, तो नीचे बैठे कर्मचारियों के दिमाग में पुरानी दिशा को मिटाने के लिए जो ऊर्जा खर्च होती है, वह मानसिक थकावट और गुस्से के रूप में बाहर आती है। वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर, आपके पसीने और खून को एक्सेल के आंकड़ों में बदलते हैं और उसे ‘ग्रोथ’ का नाम देते हैं। यह नेतृत्व नहीं है; यह ऊर्जा की चोरी है।
सूचना की भट्ठी और बहरेपन का सुकून
‘पब्लिक ऑर्डर’ या सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना वैसा ही है जैसे सड़क किनारे का कोई ढाबा वाला सड़े हुए तेल की गंध को दबाने के लिए ढेर सारी अगरबत्ती जला दे। बाहर से सब कुछ चकाचक और ‘प्रोफेशनल’ दिखता है, लेकिन पर्दे के पीछे सूचनाओं का कचरा सड़ रहा है, जिससे निकलने वाली गैस कभी भी विस्फोट कर सकती है।
खुद को बहुत समझदार मानने वाले ये उच्च अधिकारी, अपने ही द्वारा पैदा किए गए इस शोरगुल से बचने के लिए क्या करते हैं? वे दुनिया से कटने का नाटक करते हैं। वे हज़ारों रुपये के नॉइज़-कैंसलिंग हेडफ़ोन अपने कानों पर चढ़ा लेते हैं, यह सोचकर कि अगर उन्हें शोर सुनाई नहीं देगा, तो शोर का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। लेकिन भौतिकी के नियमों को आप म्यूट बटन दबाकर चुप नहीं करा सकते। बाहर रोका गया वह सारा शोर, सारी अव्यवस्था, सिस्टम के अंदर दबाव बनाती रहती है, जैसे कुकर की सीटी बजने से ठीक पहले का सन्नाटा।
अब घर जाइए और अपनी ठंडी हो चुकी दाल को बिना स्वाद लिए गले से नीचे उतारिए। आपने आज दिन भर जो ‘मेहनत’ की, वह केवल इस सड़ते हुए ढांचे को एक और दिन तक गिरने से बचाने की कोशिश थी। और याद रखिएगा, कल जब आप वापस आएंगे, तो आपकी मेज़ पर कचरे का ढेर आज से थोड़ा और बड़ा होगा। ‘लीडरशिप’ और ‘सिनर्जी’ जैसे शब्द गटर में गिरे हुए सिक्के को ढूंढने के लिए किए गए दयनीय संघर्ष का ही दूसरा नाम हैं।
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