शाम का वक़्त है, और सड़क किनारे की इस बेंच पर जमी धूल की परत मेरी पतलून को उसी रंग में रंग रही है, जिस रंग का भविष्य इन सामने से गुजरने वाले ‘कॉर्पोरेट योद्धाओं’ का है। हाथ में थामी कुल्हड़ वाली चाय अब ठंडी हो चुकी है, बिल्कुल इनकी आँखों की चमक की तरह। ये लोग अपनी टाइयों को थोड़ा ढीला करते हैं, मानो गले में पड़ी पट्टे को थोड़ा सा खिसका रहे हों, और ऐसे चलते हैं जैसे आज इन्होंने एक्सेल शीट के किसी सेल में दुनिया का नक्शा बदल दिया हो। लेकिन इनके जूतों की घिस चुकी एड़ियों और पसीने से चिपकी कमीज़ों को गौर से देखिये—वहाँ आपको ‘सफलता’ नहीं, बल्कि एक थके हुए जानवर की मजबूरी दिखेगी। “मेहनत,” “कौशल,” “करियर ग्राफ”—ये शब्द उस पुराने रेडियो की तरह हैं जो सिग्नल खो चुका है, बस शोर कर रहा है। जिसे आप ‘पवित्र श्रम’ मानते हैं, वह गणितीय दृष्टिकोण से, सांख्यिकीय डेटा के एक विशाल, निर्दयी मैनिफोल्ड (Manifold) पर एक बिंदु का निरर्थक विस्थापन मात्र है।
बाज़ार का ज्यामितीय झूठ
समाज और एच.आर. विभाग ने मिलकर एक शानदार भ्रमजाल बुना है। वे कहते हैं, “खुद को अपग्रेड करो।” यह सुनकर मुझे हंसी आती है। एक औसत कर्मचारी की उपयोगिता उस सस्ते स्मार्टफोन की बैटरी जैसी है जो 80% चार्ज दिखाते हुए भी अचानक दम तोड़ देती है। आप संगठनों में ‘पब्लिक वैल्यू’ की बातें करते हैं, लेकिन थर्मोडायनामिक्स (Thermodynamics) की नज़रों से देखें, तो एक दफ्तर सिर्फ एक ऐसा चैंबर है जहाँ मानव ऊर्जा को कम से कम शोर के साथ जलाया जाता है ताकि सिस्टम की एन्ट्रॉपी (Entropy) नियंत्रित रहे।
यह पूरा खेल दिखावे का है। जरा सोचिये, एक व्यक्ति जो अपनी ईएमआई भरने के लिए दिन-रात घिस रहा है, वह दफ्तर में एक महंगे महोगनी डेस्क के पीछे बैठकर ऐसे व्यवहार करता है जैसे वह किसी साम्राज्य का शासक हो। जबकि असलियत में वह सिर्फ कागज के टुकड़ों पर स्याही बर्बाद कर रहा है। यह वैसा ही है जैसे आप दस रुपये के समोसे को चांदी की तश्तरी में परोसें। स्वाद नहीं बदलेगा, बस आपकी मूर्खता जगजाहिर होगी। श्रम अब कोई कला नहीं रही, यह डेटा का एक कोलाज है जिसे बाज़ार अपनी सुविधा अनुसार काटता और छांटता है।
क्या बकवास है।
स्वचालित तर्क और मानवीय ‘बग’
लोग अक्सर भावुक होकर कहते हैं, “मशीनें इंसान की जगह नहीं ले सकतीं, उनमें जज़्बात नहीं होते।” बेवकूफों की तरह खुद को तसल्ली देना बंद करो। न्यूरोसाइंस के किसी भी ग्रंथ को उठाकर देख लो, जिसे तुम ‘आत्मा’ या ‘क्रिएटिविटी’ कहते हो, वह तुम्हारे न्यूरॉन्स के बीच होने वाला एक रैंडम शोर (Random Noise) है। जब हम उच्च-स्तरीय गणनात्मक प्रणालियों (Computational Systems) की बात करते हैं, तो वहां इंसान की भूमिका सिर्फ एक ‘बग’ की होती है।
स्वचालित तर्क प्रणालियाँ—जिन्हें तुम डर के मारे नाम देने से भी कतराते हो—वे उस ज्यामितीय सतह को सीधा करना चाहती हैं जिस पर काम होता है। और तुम? तुम उस सड़क के गड्ढे भरने वाली ‘गिट्टी’ हो। गिट्टी को लगता है कि वह सड़क का हिस्सा है, जबकि वह सिर्फ टायरों के नीचे कुचले जाने के लिए है। यह ‘सह-अस्तित्व’ नहीं है, यह एक क्रूर मजाक है। आप एक लक्जरी एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठकर अपनी रीढ़ की हड्डी को टेढ़ा करते हैं, ताकि कोई अदृश्य एल्गोरिदम अपनी कार्यक्षमता को 0.01% बढ़ा सके। आपकी पीठ का दर्द उस एल्गोरिदम के लिए सिर्फ एक नगण्य चर (Variable) है।
घर जाना है।
सार्वजनिक वक्रता का प्रहसन
‘सामाजिक योगदान’ का ढोल पीटने वाले ये संस्थान असल में सूचना के प्रवाह में आने वाली वक्रता (Curvature) को सीधा करने में लगे हैं। जिसे हम ‘कौशल’ कहते हैं, वह फिशर इंफॉर्मेशन मैट्रिक्स (Fisher Information Matrix) का एक छोटा सा विचलन है। आज का हुनर कल का कचरा है। याद है वो लोग जो कभी टाइपराइटर की खटपट पर गर्व करते थे? आज वे उसी धूल में मिल गए हैं जहाँ तुम्हारे कोडिंग स्किल्स या प्रेजेंटेशन बनाने की कला जल्द ही मिलने वाली है।
यह विडंबना देखिये कि लोग लाखों रुपये खर्च करके ऐसी डिग्रियाँ हासिल करते हैं, जो असल में उनकी अपनी ही नीलामी का विज्ञापन हैं। आप अपनी गर्दन पर कीमत का लेबल खुद लगा रहे हैं और खुश हो रहे हैं। यह सब एक कीमती फाउंटेन पेन से राशन की दुकान का बिल बनाने जैसा निरर्थक प्रयास है। हम एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं जहाँ मनुष्य की चेतना एक बाधा है, और हम उस बाधा को हटाने के लिए ही पुरस्कृत हो रहे हैं।
बस, अब और नहीं झेला जाता। यह चाय भी अब जहर जैसी कड़वी लग रही है।
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