पिछली बार हमने इस पर चर्चा की थी कि कैसे मानवीय महत्वाकांक्षाएँ अंततः एक बंद कमरे में रखे पुराने अखबारों के ढेर की तरह अर्थहीन और बदबूदार हो जाती हैं। आज, चलिए उस पिंजरे की बात करते हैं जिसे तुम बड़े गर्व से ‘संगठन’ या ‘कॉर्पोरेट’ कहते हो। हाथ में यह ठंडी हो चुकी चाय, जिसकी मलाई किसी गटर की काई जैसी दिख रही है, पीते हुए मुझे हंसी आती है तुम्हारे इन भारी शब्दों पर—’सिनर्जी’, ‘वैल्यू’, ‘इम्पैक्ट’। बकवास।
हकीकत यह है कि एक मल्टी-नेशनल कंपनी और नुक्कड़ पर मक्खियों से घिरी समोसे की रेहड़ी में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। दोनों ही सिस्टम थर्मोडायनामिक्स के क्रूर नियमों के गुलाम हैं; दोनों बाहर से ऊर्जा (तुम्हारा खून-पसीना) खींचते हैं और अंत में केवल गर्मी, शोर और कचरा उगलते हैं। जिसे तुम एमबीए की क्लास में ‘मैनेजमेंट’ कहते हो, वह वास्तव में थर्मोडायनामिक्स के दूसरे नियम से लड़ने की एक असफल और हास्यास्पद कोशिश मात्र है—यह वैसा ही है जैसे कोई नंगे हाथों से बहते हुए गटर को रोकने की कोशिश करे।
सड़ती हुई संरचनाएं और पसीने का हिसाब
इल्या प्रिगोगिन ने जब ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (प्रसरक संरचनाओं) की बात की थी, तो शायद उनके दिमाग में सोमवार की सुबह वाली वह सड़ांध भरी मीटिंग्स नहीं रही होंगी जहाँ आधा दर्जन लोग अपनी ही सांसों की गर्मी से कमरे का तापमान बढ़ाते हैं और बासी हवा को रीसायकल करते हैं। एक संगठन वह नाबदान है जो ‘श्रम’ रूपी ताजी ऊर्जा को निगलता है और उसे ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ के बेकार कागजों में बदल देता है। इसे मुंबई की लोकल ट्रेन के उस जनरल डिब्बे की तरह देखो जहाँ सावन की उमस में सौ लोग पचास की जगह में चिपके खड़े हैं। हर कोई अपनी जगह बचाने के लिए दूसरे की पसलियों में कोहनी मार रहा है। यह धक्का-मुक्की, यह घृणा, यह एक-दूसरे के पसीने की खट्टी बदबू को अपने शर्ट पर महसूस करना ही वह ‘कार्य’ (Work) है जो इस सड़ते हुए तंत्र को जीवित रखता है। जैसे ही यह संघर्ष थमा, तंत्र बिखर जाएगा। तुम जिसे ‘समाज सेवा’ कहते हो, वह दरअसल अपने घर की किस्तों और बिजली के बिल के डर को दफ्तर के वातानुकूलित सन्नाटे में डंप करने की एक मानसिक बीमारी है।
सोने की चेन और खाली पेट की मरोड़
श्रम का मनोविज्ञान और कुछ नहीं, बस पेट की उस मरोड़ का नाम है जो तुम्हें हर महीने की पच्चीस तारीख के बाद महसूस होती है। जिसे तुम ‘करियर ग्रोथ’ कहते हो, वह वास्तव में डोपामाइन की वह सड़ी हुई गाजर है जो तुम्हारे मालिक तुम्हें इसलिए देते हैं ताकि तुम अपनी मानसिक बैटरी के पूरी तरह फटने तक काम करते रहो। हम सब उस सस्ते स्मार्टफोन की तरह हैं जो चार्जर से हटते ही दम तोड़ देता है। और इस आंतरिक खालीपन को भरने के लिए तुम क्या करते हो? बाज़ार की शरण में जाते हो। कल ही मैंने एक बेवकूफ को देखा जो अपनी मेहनत की कमाई एक इतालवी हाथ से सिली हुई चमड़े की डायरी पर फूँक चुका था, यह सोचकर कि शायद महंगे टस्कनी चमड़े की गंध उसके जीवन की सड़ांध को ढक लेगी। क्या वाकई तुम्हें लगता है कि साढ़े तीन लाख की डायरी में अपनी नाकामियों को दर्ज करने से ब्रह्मांड की एन्ट्रापी कम हो जाएगी? यह सिर्फ तुम्हारी औकात और तुम्हारे अस्तित्वगत शून्यता के बीच खींचा गया एक महंगा पर्दा है।
शून्य का गणित और अंतिम सन्नाटा
जब हम इस प्रहसन की गहराई में उतरते हैं, तो ‘संगठन’ केवल सूचना की एक ज्यामिति रह जाता है, जहाँ तुम्हारी हैसियत एक एक्सेल शीट के सेल से ज्यादा कुछ नहीं है। यहाँ ‘सार्वजनिक हित’ वह शोर है जिसे तुम तब पैदा करते हो जब तुम डरते हो। मानवीय भावनाएं? वे केवल तुम्हारे दिमाग के न्यूरॉन्स में होने वाली शॉर्ट-सर्किट हैं। जिसे तुम ‘प्रेरणा’ कहते हो, वह केवल एड्रेनालिन का एक झटका है जो तुम्हें अगले तीन घंटों तक बिना सोचे समझे टाइपिंग करते रहने के लिए मजबूर करता है। हम सब एक विशाल इंजन के कोयले हैं, जो जलकर केवल राख और कार्बन डाइऑक्साइड पैदा कर रहे हैं, जबकि हमें मुगालता है कि हम ‘सभ्यता’ का निर्माण कर रहे हैं।
सच्चाई कड़वी है। जितनी अधिक तुम व्यवस्था बनाने की कोशिश करोगे, उतनी ही तेजी से तुम उस ‘हीट डेथ’ (Heat Death) की ओर बढ़ोगे जहाँ अंत में न कोई बॉस होगा, न कोई इंक्रीमेंट, और न ही यह मनहूस चाय। केवल एक बर्फ जैसा ठंडा और अनंत सन्नाटा। अब अपना लैपटॉप बंद करो और इस कड़वे सच को निगलो, क्योंकि अंधेरा होने वाला है।
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